सिद्धकुञ्जिकास्तोत्रम्
Siddha Kunjika Stotram
आरती संग्रह
Loading…
Argala Stotram
Durga bhajan in Sanskrit. Sung during Navratri.
Also known as: Argala Stotra, Rupam Dehi Jayam Dehi, Jayanti Mangala Kali, Devi Mahatmyam Argala
Source: Markandeya Purana / Devi Mahatmyam
Traditional / public-domain text published for cultural preservation.
Content status: verified (last reviewed 2026-10-03)
Argala Stotram
ॐ नमश्चण्डिकायै
मार्कण्डेय उवाच
ॐ जय त्वं देवि चामुण्डे जय भूतापहारिणि।
जय सर्वगते देवि कालरात्रि नमोऽस्तु ते॥ १ ॥
मधुकैटभविद्रावि विधातृवरदे नमः।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥ २ ॥
महिषासुरनिर्नाशि भक्तानां सुखदे नमः।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥ ३ ॥
धूम्रनेत्रवधे देवि धर्मकामार्थदायिनि।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥ ४ ॥
रक्तबीजवधे देवि चण्डमुण्डविनाशिनि।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥ ५ ॥
निशुम्भशुम्भनिर्नाशि त्रैलोक्यशुभदे नमः।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥ ६ ॥
वन्दिताङ्घ्रियुगे देवि सर्वसौभाग्यदायिनि।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥ ७ ॥
अचिन्त्यरूपचरिते सर्वशत्रुविनाशिनि।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥ ८ ॥
नतेभ्यः सर्वदा भक्त्या चापर्णे दुरितापहे।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥ ९ ॥
स्तुवद्भ्यो भक्तिपूर्वं त्वां चण्डिके व्याधिनाशिनि।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥ १० ॥
चण्डिके सततं युद्धे जयन्ति पापनाशिनि।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥ ११ ॥
देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि देवि परं सुखम्।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥ १२ ॥
विधेहि देवि कल्याणं विधेहि विपुलां श्रियम्।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥ १३ ॥
विधेहि द्विषतां नाशं विधेहि बलमुच्चकैः।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥ १४ ॥
सुरासुरशिरोरत्ननिघृष्टचरणेऽम्बिके।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥ १५ ॥
विद्यावन्तं यशस्वन्तं लक्ष्मीवन्तं च मां कुरु।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥ १६ ॥
देवि प्रचण्डदोर्दण्डदैत्यदर्पनिषूदिनि।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥ १७ ॥
प्रचण्डदैत्यदर्पघ्ने चण्डिके प्रणताय मे।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥ १८ ॥
चतुर्भुजे चतुर्वक्त्रसंस्तुते परमेश्वरि।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥ १९ ॥
कृष्णेन संस्तुते देवि शश्वद्भक्त्या सदाम्बिके।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥ २० ॥
हिमाचलसुतानाथसंस्तुते परमेश्वरि।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥ २१ ॥
इन्द्राणीपतिसद्भावपूजिते परमेश्वरि।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥ २२ ॥
देवि भक्तजनोद्दामदत्तानन्दोदयेऽम्बिके।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥ २३ ॥
भार्यां मनोरमां देहि मनोवृत्तानुसारिणीम्।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥ २४ ॥
तारिणीं दुर्गसंसारसागरस्याचलोद्भवे।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥ २५ ॥
इदं स्तोत्रं पठित्वा तु महास्तोत्रं पठेन्नरः।
सप्तशतीं समाराध्य वरमाप्नोति दुर्लभम्॥ २६ ॥
॥ इति श्री अर्गला स्तोत्रं समाप्तम् ॥
Read with purity of heart and devotion 🙏
More Durga Bhajans →सिद्धकुञ्जिकास्तोत्रम्
आरती संग्रह
दुर्गासूक्तम् (वैदिक)
आरती संग्रह
कात्यायनी महामाये महायोगिन्यधीश्वरि
आरती संग्रह
नवदुर्गा नामावली (प्रथमं शैलपुत्री च)
आरती संग्रह
दुर्गा नवार्ण एवं चामुण्डा बीज मन्त्र
आरती संग्रह
મારી અંબાજી મા તારા ગુણલા ગવાય (ગરબો/ભજન)
आरती संग्रह