दुर्गे दुर्घट भारी
Durge Durgat Bhari
आरती संग्रह
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Shri Durga Chalisa
Durga aarti in Hindi. Sung during Navratri.
Also known as: Durga Chalisa, Namo Namo Durge Sukha Karani, Mata Durga Chalisa
Source: Traditional Devotional
Traditional / public-domain text published for cultural preservation.
Content status: verified (last reviewed 2026-10-03)
Shri Durga Chalisa
नमो नमो दुर्गे सुख करनी।
नमो नमो अम्बे दुःख हरनी॥ १ ॥
निरङ्कार है ज्योति तुम्हारी।
तिहू लोक फैली उजियारी॥ २ ॥
शशि ललाट मुख महाविशाला।
नेत्र लाल भृकुटि विकराला॥ ३ ॥
रूप मातु को अधिक सुहावे।
दरश करत जन अति सुख पावे॥ ४ ॥
तुम संसार शक्ति लय कीना।
पालन हेतु अन्न धन दीना॥ ५ ॥
अन्नपूर्णा हुयि जग पाला।
तुम ही आदि सुन्दरी बाला॥ ६ ॥
प्रलयकाल सब नाशन हारी।
तुम गौरी शिव शङ्कर प्यारी॥ ७ ॥
शिव योगी तुम्हरे गुण गावेम्।
ब्रह्मा विष्णु तुम्हें नित ध्यावेम्॥ ८ ॥
रूप सरस्वती का तुम धारा।
दे सुबुद्धि ऋषि मुनिन उबारा॥ ९ ॥
धरा रूप नरसिंह को अम्बा।
परगट भयि फाड के खम्बा॥ १० ॥
रक्षा कर प्रह्लाद बचायो।
हिरण्याक्ष को स्वर्ग पठायो॥ ११ ॥
लक्ष्मी रूप धरो जग माहीम्।
श्री नारायण अङ्ग समाहीम्॥ १२ ॥
क्षीरसिन्धु में करत विलासा।
दयासिन्धु दीजै मन आसा॥ १३ ॥
हिङ्गलाज में तुम्हीं भवानी।
महिमा अमित न जात बखानी॥ १४ ॥
मातङ्गी धूमावति माता।
भुवनेश्वरी बगला सुखदाता॥ १५ ॥
श्री भैरव तारा जग तारिणी।
छिन्न भाल भव दुःख निवारिणी॥ १६ ॥
केहरि वाहन सोह भवानी।
लाङ्गुर वीर चलत अगवानी॥ १७ ॥
कर में खप्पर खडग विराजे।
जाको देख काल डर भाजे॥ १८ ॥
तोहे कर में अस्त्र त्रिशूला।
जाते उठत शत्रु हिय शूला॥ १९ ॥
नगरकोटि में तुम्हीं विराजत।
तिहुँ लोक में डङ्का बाजत॥ २० ॥
शुम्भ निशुम्भ दानव तुम मारे।
रक्तबीज शङ्खन संहारे॥ २१ ॥
महिषासुर नृप अति अभिमानी।
जेहि अघ भार मही अकुलानी॥ २२ ॥
रूप कराल कालिका धारा।
सेन सहित तुम तिहि संहारा॥ २३ ॥
पडी भीढ सन्तन पर जब जब।
भयि सहाय मातु तुम तब तब॥ २४ ॥
अमरपुरी अरु बासव लोका।
तब महिमा सब कहें अशोका॥ २५ ॥
ज्वाला में है ज्योति तुम्हारी।
तुम्हें सदा पूजें नर नारी॥ २६ ॥
प्रेम भक्ति से जो यश गावेम्।
दुःख दारिद्र निकट नहिं आवेम्॥ २७ ॥
ध्यावे तुम्हें जो नर मन लायि।
जन्म मरण ते सौं छुट जायि॥ २८ ॥
जोगी सुर मुनि कहत पुकारी।
योग न होयि बिन शक्ति तुम्हारी॥ २९ ॥
शङ्कर आचारज तप कीनो।
काम अरु क्रोध जीत सब लीनो॥ ३० ॥
निशिदिन ध्यान धरो शङ्कर को।
काहु काल नहिं सुमिरो तुमको॥ ३१ ॥
शक्ति रूप को मरम न पायो।
शक्ति गयी तब मन पछतायो॥ ३२ ॥
शरणागत हुयि कीर्ति बखानी।
जय जय जय जगदम्ब भवानी॥ ३३ ॥
भयि प्रसन्न आदि जगदम्बा।
दयि शक्ति नहिं कीन विलम्बा॥ ३४ ॥
मोको मातु कष्ट अति घेरो।
तुम बिन कौन हरै दुःख मेरो॥ ३५ ॥
आशा तृष्णा निपट सतावेम्।
रिपु मूरख मोहि अति दर पावैम्॥ ३६ ॥
शत्रु नाश कीजै महारानी।
सुमिरौं इकचित तुम्हें भवानी॥ ३७ ॥
करो कृपा हे मातु दयाला।
ऋद्धि-सिद्धि दे करहु निहाला॥ ३८ ॥
जब लगि जियू दया फल पावू।
तुम्हरो यश मैं सदा सुनावू॥ ३९ ॥
दुर्गा चालीसा जो गावै।
सब सुख भोग परमपद पावै॥ ४० ॥
देवीदास शरण निज जानी।
करहु कृपा जगदम्ब भवानी॥
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