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Aarti Kunj Bihari Ki
आरती कुञ्ज बिहारी की ।
श्री गिरधर कृष्ण मुरारी की ॥ || धृ ||
गले में बैजंती माला ।
बजावे मुरली मधुर बाला ॥
श्रवन में कुंडल झलकाला ।
नंद के आनंद नंद लाला ।
गगन सम अंग कांति काली ।
राधिका चमक रही आली ।
लतन में ठाडे बनमाली ॥
आरती कुञ्ज बिहारी की ।
श्री गिरधर कृष्ण मुरारी की ॥ || धृ ||
कनकमय मोर मुकुट बिलसै ।
देवता दर्शन को तरसैं ॥
गगन सों सुमन रासि बरसैं ।
हँसत मुख मधुर मृदुल हँसैं ।
जा छबि को रसिक ऋषि जोगी ।
ध्यान लगावत पुनि जोगी ।
तन मन धन सब अरपन गोगी ॥
आरती कुञ्ज बिहारी की ।
श्री गिरधर कृष्ण मुरारी की ॥ || धृ ||